भोपाल। मध्य प्रदेश में 21 साल बाद सार्वजनिक बस सेवा की वापसी के साथ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की ‘मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा’ की शुरुआत हुई है। 25 सितंबर को भोपाल से इस सेवा के तहत 351 बसों को रवाना किया गया। इन बसों की पहचान भगवा रंग से की गई है। सरकार का दावा है कि यह सेवा प्रदेश में सुरक्षित, आधुनिक और सुलभ सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध कराने की दिशा में बड़ा कदम है।
लेकिन अब राजधानी भोपाल से सामने आया एक मामला इस पूरी व्यवस्था की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े कर रहा है।
बताया जा रहा है कि सेंट्रल लाइब्रेरी के पास एक बस खराब होकर घंटों सड़क पर खड़ी रही। स्थानीय जानकारी के मुताबिक बस सुबह करीब 7 बजे खराब हुई और दोपहर 2 बजे तक वहीं खड़ी रही। इस दौरान यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ा और उन्हें बस से उतरकर सड़क पर खड़ा होना पड़ा।
सवाल यह है कि जब प्रदेश में नई परिवहन व्यवस्था शुरू की जा रही है और बसों को आधुनिक एवं बेहतर सार्वजनिक परिवहन के तौर पर पेश किया जा रहा है, तो क्या उनके फिटनेस, रखरखाव और समय पर तकनीकी जांच की व्यवस्था भी उतनी ही मजबूत है?
विपक्ष की ओर से पहले ही बसों के रंग और नाम को लेकर सरकार पर राजनीतिक तंज किए जा चुके हैं। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी बसों के भगवा रंग को लेकर कांग्रेस पर टिप्पणी की थी।
ऐसे में आम लोगों का सवाल इससे भी बड़ा है-बस का रंग क्या है, यह महत्वपूर्ण है या बस की हालत और यात्रियों की सुरक्षा?
अगर पुरानी अथवा अपनी निर्धारित अवधि पूरी कर चुकी बसों को केवल रंग-रोगन और रेडियम लगाकर सड़कों पर चलाया जा रहा है, तो यह बेहद गंभीर विषय होगा। हालांकि, संबंधित बस की उम्र, फिटनेस प्रमाणपत्र और परमिट की स्थिति की आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है।
सरकार ने नई परिवहन व्यवस्था में सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात कही है। बसों में CCTV, GPS, पैनिक बटन और रियल-टाइम ट्रैकिंग जैसी सुविधाओं का भी उल्लेख किया गया है।
ऐसे में अब जरूरत इस बात की है कि परिवहन विभाग यह स्पष्ट करे कि सड़क पर चल रही प्रत्येक बस की फिटनेस कब जांची गई, उसकी वैधता कितनी है और खराब होने की स्थिति में यात्रियों को वैकल्पिक व्यवस्था कितनी जल्दी उपलब्ध कराई जाती है।
क्योंकि जनता को बस का रंग नहीं, सुरक्षित और भरोसेमंद सफर चाहिए।
अब सवाल यही है,
क्या ‘सुगम परिवहन’ सिर्फ भगवा रंग में नजर आएगा, या यात्रियों के सफर में भी सुगमता दिखाई देगी?