नई दिल्ली। बार की स्वतंत्रता और अधिवक्ताओं के अधिकारों से जुड़े मुद्दे को लेकर आज सुप्रीम कोर्ट के डी गेट के बाहर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया। प्रदर्शन का नेतृत्व झारखंड हाईकोर्ट की अधिवक्ता स्वाति सिन्हा ने किया। इस दौरान झारखंड समेत देश के विभिन्न राज्यों से महिला और पुरुष अधिवक्ताओं ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया।

प्रदर्शनकारियों ने योगमाया बनाम भारत संघ मामले में महिलाओं के लिए निर्धारित 30 प्रतिशत आरक्षण के तहत सहयोजन (को-ऑप्शन) की व्यवस्था पर सवाल उठाए। अधिवक्ताओं का कहना है कि जब चुनाव में महिला उम्मीदवारों ने हिस्सा लिया और कुछ उम्मीदवार छठे-सातवें स्थान तक पहुंचीं, तो उन्हें सहयोजित करने के बजाय ऐसी महिलाओं को शामिल करने का निर्णय क्यों लिया जा रहा है, जिन्होंने चुनाव में भाग ही नहीं लिया।

अधिवक्ता स्वाति सिन्हा ने कहा कि उनका विरोध महिलाओं के आरक्षण के खिलाफ नहीं, बल्कि सहयोजन की प्रक्रिया और बार की स्वतंत्रता को लेकर है। उनका आरोप है कि इस तरह की व्यवस्था से पक्षपात और पसंदीदा लोगों को लाभ पहुंचाने की संभावना बढ़ सकती है।

प्रदर्शनकारियों के मुताबिक, बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी इस मामले में एक वैकल्पिक व्यवस्था का सुझाव दिया था, जिसमें चुनाव में छठे और सातवें स्थान पर रहने वाली महिला उम्मीदवारों को सहयोजित करने की बात कही गई थी। उनका कहना है कि पहले इस व्यवस्था को निष्पक्ष तंत्र माना गया था, लेकिन बाद में 4 अगस्त 2026 के आदेश में एक वरिष्ठ अधिवक्ता और एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को सहयोजित करने की व्यवस्था की गई।

प्रदर्शन के दौरान अनुच्छेद 220 का भी हवाला देते हुए सवाल उठाया गया कि हाईकोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश अपने संबंधित राज्य में वकालत नहीं कर सकतीं, ऐसे में बार काउंसिल से जुड़े पद पर उनकी नियुक्ति को लेकर कानूनी स्थिति क्या होगी।

अधिवक्ताओं ने कहा कि एडवोकेट्स एक्ट, 1961 और बार काउंसिल ऑफ इंडिया जैसी संस्थाओं के मौजूद होने के बावजूद यदि बार के आंतरिक मामलों में न्यायपालिका का हस्तक्षेप बढ़ता है, तो इससे बार की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।

प्रदर्शनकारियों ने कहा कि लोकतंत्र में मतदाताओं की इच्छा सर्वोपरि होती है। जिन अधिवक्ताओं ने चुनाव में उम्मीदवारों को वोट देकर अपनी पसंद जाहिर की, उनकी इच्छा को दरकिनार करना उचित नहीं है।

अधिवक्ताओं ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति या महिला आरक्षण का विरोध करना नहीं, बल्कि बार की स्वतंत्रता, निष्पक्ष प्रक्रिया और लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा करना है।